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Sunday, August 31, 2008

जयघोष

गायत्री माता की - जय।
यज्ञ भगवान् की - जय।
वेद भगवान् की - जय।
भारतीय संस्कृति की - जय।
भारत माता की - जय।
एक बनेंगे - नेक बनेंगे।
हम सुधरेंगे - युग सुधरेगा।
हम बदलेंगे - युग बदलेगा।
विचार क्रान्ति अभियान - सफल हो, सफल हो, सफल हो।
ज्ञान यज्ञ की लाल मशाल- सदा जलेगी-सदा जलेगी।
ज्ञान यज्ञ की ज्योति जलाने- हम घर-घर में जायेंगे।
नया सवेरा नया उजाला- इस धरती पर लायेंगे।
नया समाज बनायेंगे- नया जमाना लायेंगे।
जन्म जहॉं पर- हमने पाया।
अन्न जहॉं का- हमने खाया।
वस्त्र जहॉं के- हमने पहने।
ज्ञान जहॉं से- हमने पाया।
वह हैं प्यारा- देश हमारा।
देश की रक्षा कौन करेगा- हम करेंगे, हम करेंगे।
युग निर्माण कैसे होगा- व्यक्ति के निर्माण से।
मॉं का मस्तक ऊंचा होगा- त्याग और बलिदान से।
नित्य सूर्य का ध्यान करेंगे- अपनी प्रतिभा प्रखर करेंगे।
मानव मात्र- एक समान।
जाति वंश सब- एक समान।
नर और नारी- एक समान।
नारी का सम्मान जहॉं हैं- संस्कृति का उत्थान वहॉं है।
जागेगी भाई जागेगी- नारी शक्ति जागेगी।
हमारी युग निर्माण योजना- सफल हो, सफल हो, सफल हो।
हमारा युग निर्माण सत्संकल्प- पूर्ण हो, पूर्ण हो, पूर्ण हो।
इक्कीसवीं सदी- उज्ज्वल भविष्य।
वन्दे वेद मातरम्।।

Friday, August 29, 2008

शहीदों के प्रति

रक्त से लिखा गया हैं, विजय का इतिहास जो।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

रक्त की हर बूंद , जन-जन के ह्रदय में लिख गयी।
राष्ट्र-श्रद्धा, आपके हाथों सहज ही बिक गयी।।
बल दिया बलिदान ने, इस राष्ट्र के विश्वास को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

राष्ट्र की रग-रग फड़कती, आपके बलिदान से।
राष्ट्र प्यारा हो गया हैं, हम सभी को प्राण से।।
राष्ट्र पर हम भी करेंगे समर्पित हर साँस को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

आपकी गाथा सुनाई जायेगी , संतान को।
और माताएँ भरेंगी सुतों में स्वाभिमान को।।
छू लिया हैं आपने बलिदान के आकाश को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

आपका परिवार अब राष्ट्रीय धरोहर हो गया।
त्याग उसका, राष्ट्र के सम्मुख उजागर हो गया।।
राष्ट्र मुरझाने न देगा, आपके मधुमास को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

आओ ! सब मिल, “शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करें।
राष्ट्र के रक्षार्थ, सब कुछ मिटाने का व्रत धरें।।
ताकि जीवित रख सकें, उत्सर्ग के इतिहास को।
राष्ट्र का वंदन हैं, उस उत्सर्ग के उल्लास को।।

-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
अखण्ड ज्योति, जनवरी २००२

Monday, August 11, 2008

साबरमती के सन्त

दे दी हमें आज़ादी बिना खड्‌ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
आँधी में भी जलती रही गाँधी तेरी मशाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...

धरती पे लड़ी तूने अजब ढंग की लड़ाई
दागी न कहीं तोप न बंदूक चलाई
दुश्मन के किले पर भी न की तूने चढ़ाई
वाह रे फ़कीर खूब करामात दिखाई
चुटकी में दुश्मनों को दिया देश से निकाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
रघुपति राघव राजा राम

शतरंज बिछा कर यहाँ बैठा था ज़माना
लगता था मुश्किल है फ़िरंगी को हराना
टक्कर थी बड़े ज़ोर की दुश्मन भी था ताना
पर तू भी था बापू बड़ा उस्ताद पुराना
मारा वो कस के दांव के उलटी सभी की चाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
रघुपति राघव राजा राम

जब जब तेरा बिगुल बजा जवान चल पड़े
मज़दूर चल पड़े थे और किसान चल पड़े
हिंदू और मुसलमान, सिख पठान चल पड़े
कदमों में तेरी कोटि कोटि प्राण चल पड़े
फूलों की सेज छोड़ के दौड़े जवाहरलाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
रघुपति राघव राजा राम

मन में थी अहिंसा की लगन तन पे लंगोटी
लाखों में घूमता था लिये सत्य की सोंटी
वैसे तो देखने में थी हस्ती तेरी छोटी
लेकिन तुझे झुकती थी हिमालय की भी चोटी
दुनिया में भी बापू तू था इन्सान बेमिसाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी ...
रघुपति राघव राजा राम

जग में जिया है कोई तो बापू तू ही जिया
तूने वतन की राह में सब कुछ लुटा दिया
माँगा न कोई तख्त न कोई ताज भी लिया
अमृत दिया तो ठीक मगर खुद ज़हर पिया
जिस दिन तेरी चिता जली, रोया था महाकाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल
साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल
रघुपति राघव राजा राम

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