अपने पीयूष अनुदानो का, जनता को पान करायेगी ।
आया वह पवित्र ब्रम्हमुहूर्त, जब नारी सतयुग लायेगी ।।
ऊषाकाल का उदभव हो रहा, अरुणोदय की पावन बेला हैं,
यज्ञ की बेदी सजी कहीं, कहीं नर-समूहो का मेला हैं,
ऐसे सुन्दर उपवन में, युग परिवर्तन का बिगुल बजायेगी ।
आया वह पवित्र ब्रम्हमुहूर्त, जब नारी सतयुग लायेगी ।।
करी जीव सृष्टि की संरचना, चेतना का संचार किया,
प्रसव वेदना को सह, माता बनकर प्यार दिया,
श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा, बन, इस अनुकम्पा का एहसास दिलायेगी
आया वह पवित्र ब्रम्हमुहूर्त, जब नारी सतयुग लायेगी ।।
देवयुग्मो में प्रथम नारी, तत्पश्चात नर का आए नाम,
उमा-महेश, ‘शची-पुरन्दर, चाहे हो वह सीता-राम,
मानुषी रुप में देवी हैं, इस तथ्य को ज्ञात करायेगी ।
आया वह पवित्र ब्रम्हमुहूर्त, जब नारी सतयुग लायेगी ।।
नारी हृदय हैं निर्मल-कोमल, प्रेम भंडार छुपा हैं सारा,
मानवता का सिंचन करने, निकले इससे अमृत-धारा,
मुर्छित वसुन्धरा पर पुन: जाग्रती आएगी ।
आया वह पवित्र ब्रम्हमुहूर्त, जब नारी सतयुग लायेगी ।।
-साधना मित्तल
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1997
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Wednesday, September 10, 2008
Sunday, September 7, 2008
माटी का संदेशा
फिर से संस्कार परिपाटी, घर-घर जाए मनाई।
गुरुग्राम की पावनमाटी, यही संदेशा लाई।।
यह वह परम्परा हैं जिसने, घर-घर दिए जलाए।
सोलह संस्कारों के द्वारा, वीररत्न उपजाए।
धु्रव, प्रहलाद, राम, लक्ष्मण सब, इसी ज्योति के जाए।
भरत, शत्रुघन और अभिमन्यु इसी ज्योति से पाये।
नवनिहाल बच्चों की फिर से, इस विधि करो गढ़ाई।।
क्यों जन्मे ऐसे दुनिया मे, यह मनुष्य तन पाया।
मता-पिता बांधवो तक ने, कुछ भी नहीं बताया।
ऋषियों ने था पहले से ही, ऐसा चक्र चलाया।
जन्म, मरण, मरणोत्ततर जीवन का सारा रहस्य बताया।
नामकरण-यज्ञोपवीत तक, सबकी विधि बतलाई।।
मुण्डन, विद्यारम्भ, अन्नप्राशन, जो नहीं कराते।
उनके बालक माटी के, माधव बनकर रह जाते।
क्यों विवाह में आखिर जुड़ते, इतने रिश्ते-नाते।
यह संस्कार भॉंवरों तक का, भेद सभी बतलाते।
उनको समझा नहीं गृहस्थी, नाहक मूढ़ बसाई।।
यह मनुष्य तन हैं अमूल्य, मत समझो इसको माटी।
जिसने समझा नहीं उसे तो निपट मौत की घाटी।
ज्ञानी सोच-समझ कर काटे, मूरख रो-रो काटी।
संस्कार हँस-हँसकर जीवन जीने की परिपाटी।।
परम्परा यह अति महान हैं जाए नहीं भुलाई।।
बलराम सिंह परिहार
अखण्ड ज्योति अप्रेल 1998
गुरुग्राम की पावनमाटी, यही संदेशा लाई।।
यह वह परम्परा हैं जिसने, घर-घर दिए जलाए।
सोलह संस्कारों के द्वारा, वीररत्न उपजाए।
धु्रव, प्रहलाद, राम, लक्ष्मण सब, इसी ज्योति के जाए।
भरत, शत्रुघन और अभिमन्यु इसी ज्योति से पाये।
नवनिहाल बच्चों की फिर से, इस विधि करो गढ़ाई।।
क्यों जन्मे ऐसे दुनिया मे, यह मनुष्य तन पाया।
मता-पिता बांधवो तक ने, कुछ भी नहीं बताया।
ऋषियों ने था पहले से ही, ऐसा चक्र चलाया।
जन्म, मरण, मरणोत्ततर जीवन का सारा रहस्य बताया।
नामकरण-यज्ञोपवीत तक, सबकी विधि बतलाई।।
मुण्डन, विद्यारम्भ, अन्नप्राशन, जो नहीं कराते।
उनके बालक माटी के, माधव बनकर रह जाते।
क्यों विवाह में आखिर जुड़ते, इतने रिश्ते-नाते।
यह संस्कार भॉंवरों तक का, भेद सभी बतलाते।
उनको समझा नहीं गृहस्थी, नाहक मूढ़ बसाई।।
यह मनुष्य तन हैं अमूल्य, मत समझो इसको माटी।
जिसने समझा नहीं उसे तो निपट मौत की घाटी।
ज्ञानी सोच-समझ कर काटे, मूरख रो-रो काटी।
संस्कार हँस-हँसकर जीवन जीने की परिपाटी।।
परम्परा यह अति महान हैं जाए नहीं भुलाई।।
बलराम सिंह परिहार
अखण्ड ज्योति अप्रेल 1998
Saturday, September 6, 2008
कृपा तुम्हारी जो मिल गई
कृपा तुम्हारी जो मिल गई तो, विचार-विभ्रम नहीं रहेगा,
विकास-पथ पर न विघ्न होंगे, कहीं व्यतिक्रम नहीं रहेगा।
कहीं पे निर्जन अलंघ्य वन हो, अपार पर्वत, अगम्य घाटी,
अछोर सागर, अनंत जल हो, या शुष्क मरुथल, सुरम्य माटी,
कहीं न भय या विभ्रांति होगी, दिशा-दिशा में प्रकाश होगा,
नहीं निराशा, प्रमाद का फिर प्रभाव कोई भी पास होगा,
हमारा संकल्प और साहस अशक्त या कम नहीं रहेगा।
प्रभो! हमें दो वो कर्म-कौशल, जो मन कहीं पर न डगमगाए,
प्रत्येक कर्तव्य-कर्म केवल, तुम्हारी आभा से जगमगाए,
चरित्र-चिंतन की गंध से हो, पवित्र वातावरण हमारा,
सुपात्रता से ही पा सकें फिर, तुम्हारी बाहों का हम सहारा,
हमारा पुरुषार्थ फिर किसी पल, तनिक भी अक्षम नहीं रहेगा।
समर्थ गुरु! आपकी कृपा की,सुछत्रछाया में कान्ति होगी,
किसी हृदय में न वेदना या असीम पीड़ा-अशांति होगी,
न कंठ में कोई स्वर घुटेंगे, सभी का दु:ख-दर्द व्यक्त होगा,
अध्यात्म-बल की समृद्धि पाकर, प्रत्येक मानव सशक्त होगा,
शरीर, चिंतन, समय व धन का, कहीं असंयम नहीं रहेगा।
अनंत संघर्ष हम करेंगे, न भीत होंगे कुरीतियों से,
न संप्रदायो से, जातियों से, समाज की क्रूर नीतियों से,
नहीं टिकेंगी हमारे सम्मुख, गलित प्रथाएं या मान्यताएं,
नहीं भरेगी किसी भी पथ को, तिमिर से कोई अंधताएं,
स्वयं करेंगे सृजन नियोजित, विनाश का क्रम नहीं रहेगा।
कृपा तुम्हारी जो मिल गई तो, विचार-विभ्रम नहीं रहेगा।
अखण्ड ज्योति नवम्बर 2007
विकास-पथ पर न विघ्न होंगे, कहीं व्यतिक्रम नहीं रहेगा।
कहीं पे निर्जन अलंघ्य वन हो, अपार पर्वत, अगम्य घाटी,
अछोर सागर, अनंत जल हो, या शुष्क मरुथल, सुरम्य माटी,
कहीं न भय या विभ्रांति होगी, दिशा-दिशा में प्रकाश होगा,
नहीं निराशा, प्रमाद का फिर प्रभाव कोई भी पास होगा,
हमारा संकल्प और साहस अशक्त या कम नहीं रहेगा।
प्रभो! हमें दो वो कर्म-कौशल, जो मन कहीं पर न डगमगाए,
प्रत्येक कर्तव्य-कर्म केवल, तुम्हारी आभा से जगमगाए,
चरित्र-चिंतन की गंध से हो, पवित्र वातावरण हमारा,
सुपात्रता से ही पा सकें फिर, तुम्हारी बाहों का हम सहारा,
हमारा पुरुषार्थ फिर किसी पल, तनिक भी अक्षम नहीं रहेगा।
समर्थ गुरु! आपकी कृपा की,सुछत्रछाया में कान्ति होगी,
किसी हृदय में न वेदना या असीम पीड़ा-अशांति होगी,
न कंठ में कोई स्वर घुटेंगे, सभी का दु:ख-दर्द व्यक्त होगा,
अध्यात्म-बल की समृद्धि पाकर, प्रत्येक मानव सशक्त होगा,
शरीर, चिंतन, समय व धन का, कहीं असंयम नहीं रहेगा।
अनंत संघर्ष हम करेंगे, न भीत होंगे कुरीतियों से,
न संप्रदायो से, जातियों से, समाज की क्रूर नीतियों से,
नहीं टिकेंगी हमारे सम्मुख, गलित प्रथाएं या मान्यताएं,
नहीं भरेगी किसी भी पथ को, तिमिर से कोई अंधताएं,
स्वयं करेंगे सृजन नियोजित, विनाश का क्रम नहीं रहेगा।
कृपा तुम्हारी जो मिल गई तो, विचार-विभ्रम नहीं रहेगा।
अखण्ड ज्योति नवम्बर 2007
Monday, September 1, 2008
Winners vs Losers
The Winner always has a plan;
The Loser always has an excuse.
The Winner says “let me do it for you”;
The Loser says “that’s not my job”.
The Winner is always a part of the answer;
The Loser is always a part of the problem.
The Winner sees an answer in every problem;
The Loser sees a problem in every answer.
The Winner sees a green near every sand rap;
The Loser sees a sand rap near every green.
The Winner says “it may be difficult but it’s possible”;
The Loser says “it may be possible but it’s difficult”.
The Loser always has an excuse.
The Winner says “let me do it for you”;
The Loser says “that’s not my job”.
The Winner is always a part of the answer;
The Loser is always a part of the problem.
The Winner sees an answer in every problem;
The Loser sees a problem in every answer.
The Winner sees a green near every sand rap;
The Loser sees a sand rap near every green.
The Winner says “it may be difficult but it’s possible”;
The Loser says “it may be possible but it’s difficult”.
BE HELPING HAND, PLEDGE YOUR EYES TO THE NATION AND BE SOMEONE’S HOPE FOR THE LIGHT.
Tuesday, August 26, 2008
युगानुरुप परिवार
विश्व भर में हैं हमारा पारिवारिक संगठन,
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
हो गया अब तों मिशन का व्योम-सा विस्तार हैं,
विश्व के हर छोर को छूता विषद परिवार हैं,
यत्न हो अपना कि घर में भी जटिल शैली न हो,
दृष्टि सबकी स्वच्छ हो, दिग्भ्रांत मटमैली न हो,
धैर्यपूर्वक हम करें हर प्रश्न -शंका का शमन।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
विश्व-मन में आस्था फिर आज अंकुराने लगी ,
अब विधेयात्मक पुन: होने लगी हैं जिंदगी,
उस सुखद वातावरण की सृष्टि घर में भी करें,
भावना संवेदना-सहकार की, सबमें भरें ,
हो घरों में भी उसी निर्दिष्ट पथ का अनुसरण।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
विश्व के परिवार का लघु रुप घर परिवार हो,
हो सहज सामीप्य सब में, आत्मवत् व्यवहार हो,
हो नहीं संकीर्णता, सबकी सुविस्तृत सोच हो,
दोष-स्वीकृति में किसी को भी नहीं संकोच हो,
हो सरल, विश्वास -आधारित परस्पर आचरण।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
हर सुखद परिवार हो ऐसा, कि ज्यों उद्यान हो,
वृक्षवत् सुंदर सुगढ़ व्यिक्तत्व का निर्माण हो,
हर विटप को संस्कृति से यूँ सतत पोषण मिले,
वह न झंझावात के आघात से तिल भर हिले,
हो न पाए फिर वहां कोई विषेला संक्रमण।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
उस विषद परिवार का प्रत्येक घर आदर्श हो,
कुप्रथाओं से सभी का संगठित संघर्ष हो,
शान्ति हो, संतोष हो, मन हो न कोई क्लेश में,
हो सहज शालीनता व्यवहार, वाणी, वेश में,
आधुनिकता हो वहां , पर हो न कृत्रिम आवरण।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
अखण्ड ज्योति दिसम्बर २००७
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
हो गया अब तों मिशन का व्योम-सा विस्तार हैं,
विश्व के हर छोर को छूता विषद परिवार हैं,
यत्न हो अपना कि घर में भी जटिल शैली न हो,
दृष्टि सबकी स्वच्छ हो, दिग्भ्रांत मटमैली न हो,
धैर्यपूर्वक हम करें हर प्रश्न -शंका का शमन।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
विश्व-मन में आस्था फिर आज अंकुराने लगी ,
अब विधेयात्मक पुन: होने लगी हैं जिंदगी,
उस सुखद वातावरण की सृष्टि घर में भी करें,
भावना संवेदना-सहकार की, सबमें भरें ,
हो घरों में भी उसी निर्दिष्ट पथ का अनुसरण।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
विश्व के परिवार का लघु रुप घर परिवार हो,
हो सहज सामीप्य सब में, आत्मवत् व्यवहार हो,
हो नहीं संकीर्णता, सबकी सुविस्तृत सोच हो,
दोष-स्वीकृति में किसी को भी नहीं संकोच हो,
हो सरल, विश्वास -आधारित परस्पर आचरण।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
हर सुखद परिवार हो ऐसा, कि ज्यों उद्यान हो,
वृक्षवत् सुंदर सुगढ़ व्यिक्तत्व का निर्माण हो,
हर विटप को संस्कृति से यूँ सतत पोषण मिले,
वह न झंझावात के आघात से तिल भर हिले,
हो न पाए फिर वहां कोई विषेला संक्रमण।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
उस विषद परिवार का प्रत्येक घर आदर्श हो,
कुप्रथाओं से सभी का संगठित संघर्ष हो,
शान्ति हो, संतोष हो, मन हो न कोई क्लेश में,
हो सहज शालीनता व्यवहार, वाणी, वेश में,
आधुनिकता हो वहां , पर हो न कृत्रिम आवरण।
हो उसी अनुरुप घर-परिवार का वातावरण।
अखण्ड ज्योति दिसम्बर २००७
Tuesday, August 19, 2008
"धन्य हैं वे"
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
धन्य हैं वे लेखनी, गुणगान गुरु का जो लिखें।।
प्राण में गुरुतत्त्व की, गुरुता मचलती ही रहे।
कर्म में सदगुरु की, गरिमा उछलती ही रहें।।
आचरण वे धन्य, गुरु आदर्श जो धारण करें।
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
ज्ञान के हैं सिन्धु सदगुरु, ज्ञान के हम बिन्दु हों।
चंद्र से हैं सौम्य सद्गुरु, शान्ति के हम इंदु हों।।
ज्ञान का आलोक बांटे , हम सुधा जैसा झरें।
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
छलछलाता भाव-संवेदन, भरे हैं सदगुरु।
दुखी जन पर, द्रवित करुणा-सा झरे हैं सदगुरु।।
भाव-मरहम लगा, रिसते घाव दुखियों के भरे।
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
मनुजता पीड़ित हुई हैं, मनुज के व्यवहार से।
सतत उठती जा रही संवेदना, संसार से।।
मानवीय संवेदना का, स्वर्ग हम सर्जित करें।
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
अखण्ड ज्योति नवम्बर २००५
धन्य हैं वे लेखनी, गुणगान गुरु का जो लिखें।।
प्राण में गुरुतत्त्व की, गुरुता मचलती ही रहे।
कर्म में सदगुरु की, गरिमा उछलती ही रहें।।
आचरण वे धन्य, गुरु आदर्श जो धारण करें।
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
ज्ञान के हैं सिन्धु सदगुरु, ज्ञान के हम बिन्दु हों।
चंद्र से हैं सौम्य सद्गुरु, शान्ति के हम इंदु हों।।
ज्ञान का आलोक बांटे , हम सुधा जैसा झरें।
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
छलछलाता भाव-संवेदन, भरे हैं सदगुरु।
दुखी जन पर, द्रवित करुणा-सा झरे हैं सदगुरु।।
भाव-मरहम लगा, रिसते घाव दुखियों के भरे।
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
मनुजता पीड़ित हुई हैं, मनुज के व्यवहार से।
सतत उठती जा रही संवेदना, संसार से।।
मानवीय संवेदना का, स्वर्ग हम सर्जित करें।
धन्य हैं वे धडकने, सतनाम गुरु का जो जपें।
-मंगलविजय ‘विजयवर्गीय’
अखण्ड ज्योति नवम्बर २००५
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